29 March 2011

कैसे बचोगी तुम?

आखिर कब तक
और ,
कैसे बचोगी तुम?
हमने
पूरा जाल बुन रखा है,
पहले तुम्हे गर्भ में,
फिर,
घर में,
पंचायत  में,
फिर भी
बच गई तो
ससुराल में
मार डालेंगे.

हम तुम्हे आदर देंगे
"माँ" के रूप में
दुलार करेंगे,
"बेटी" के रूप में,
प्यार करेंगे,
"पत्नी "के रूप में,

फिर भी बच गयी तो.....
सरेआम
छीटाकशी
इज्जत को तारतार करेंगे,
"भोग्या" का तमगा
सेक्स सिम्बल  बना
लोगों में परोस देंगे,

आखिर कब तक
और ,
कैसे बचोगी तुम?

अब  तुम
"श्रद्धा" की पात्र नहीं हो,
संपत्ति हो,
व्यक्ति नहीं,
बला हो,व्यापार हो,  .
मुक्ति मिली तो,
बला टली,
बची तो..
व्यापार हुआ.....










3 comments:

  1. उम्दा शब्दों का जाल बिछाये हैं मजा आ गया |

    यहाँ भी आयें.......
    यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो फालोवर अवश्य बने .साथ ही अपने सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ . हमारा पता है ... www.akashsingh307.blogspot.com

    ReplyDelete
  2. संपत्ति हो,
    व्यक्ति नहीं,
    बला हो,व्यापार हो, .
    मुक्ति मिली तो,
    बला टली,
    बची तो..
    व्यापार हुआ.....

    अत्यंत यथार्थवादी पंक्तियां...
    सच्चाई को वयां करती हुई कविता के लिए हार्दिक बधाई...

    ReplyDelete
  3. धार्मिक मुद्दों पर परिचर्चा करने से आप घबराते क्यों है, आप अच्छी तरह जानते हैं बिना बात किये विवाद ख़त्म नहीं होते. धार्मिक चर्चाओ का पहला मंच ,
    यदि आप भारत माँ के सच्चे सपूत है. धर्म का पालन करने वाले हिन्दू हैं तो
    आईये " हल्ला बोल" के समर्थक बनकर धर्म और देश की आवाज़ बुलंद कीजिये...
    अपने लेख को हिन्दुओ की आवाज़ बनायें.
    इस ब्लॉग के लेखक बनने के लिए. हमें इ-मेल करें.
    हमारा पता है.... hindukiawaz@gmail.com
    समय मिले तो इस पोस्ट को देखकर अपने विचार अवश्य दे
    देशभक्त हिन्दू ब्लोगरो का पहला साझा मंच
    हल्ला बोल

    ReplyDelete