20 January 2012

राजनीतिक चंदा


चुनावी मौसम में आये दिन करोड़ो रूपये और शराब पकडे जाने से ये साफ़ हो जाता है की  वर्तमान चुनाव प्रणाली में चुनाव के दौरान बहुत बड़े मात्रा में धन खर्च होता है. बाहुबली और अपराधी किस्म के लोगों के पास अवैध तरीके से इकट्ठा किया गया धन बड़े मात्रा में होता है. यह सर्वविदित तथ्य है. इसी धन के बलबूते ऐसे लोग  चुनाव जीत कर संसद व विधानसभा में पहुँच जाते हैं. जिसके चलते  भी देश में भ्रष्टाचार अपने चरम सीमा पर पहुच चूका है.ऐसे लोगों से आम जनता भ्रष्टाचार दूर करने की आशा भी कैसे कर सकती है. क्या चोर चोरी पकड़वाएगा?
इसी मौके की नजाकत को भांप कर देश के बड़े व्यापरिक घराने राजनीतिक दलों को कानूनी ढंग से चंदा देने का रवैया बड़ी तेजी से अपना रहे हैं. सभी राजनितिक दलों को चंदा देके, व्यापरिक घराने एक खतरनाक खेल को सुरक्षित ढंग से खेलते हुए, संतुलन साधने के कोशिश कर रहे हैं. राजनीतिक और व्यापरिक घरानो का ये घिनौना गठजोड़ देश की बदहाली हेतु  सबसे अधिक जिम्मेदार है.  आधरभूत संरचना और विकास के नाम पर किसानो की जमीन छीन कर , व्यापरिक घरानो को विशेष आर्थिक क्षेत्र, आवासीय फ्लैट, पार्क, एक्सप्रेसवे और अन्य  कई गैर जरूरी कामो हेतु औने पौने कीमत पर बाटने का घटिया खेल चल रहा है.
इस साल के ५ राज्यों के चुनाव में आदित्य बिड़ला समूह ने राजनीतिक दलों को कानूनी चंदे की रकम बढा के चार गुना(३० करोड़), जबकि भारती समूह  ने कानूनी चंदे की रकम घटा के १७ करोड़ से शुन्य कर दिया है.अगर टू जी घोटाला नहीं हुआ होता तो भारती समूह की चंदे के कहानी भी कुछ और ही होता.
देश के मुख्य दल : कांग्रेस व भाजपा के तमाम ज्ञात (?) स्रोतों से क्रमश: ८४ करोड़ और ८२ करोड़ मिल चुके हैं. राकांपा जैसी क्षेत्रीय दल ने भी ३ करोड़ हथिया लिए हैं.
एक आकड़ा पेश है:
कंपनी                                      रकम ( करोड़ रूपया में )
जनरल इलेक्टोरल ट्रस्ट (आदित्य बिड़ला समूह )        ३०.६
एशियानेट टीवी होल्डिंग प्रा. लि.                      १२.५
टोरेंट पावर लि.                                          १०.६
इलेक्टोरल ट्रस्ट (टाटा समूह)                         ९.८
इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेन्ट एंड कंसल्टेंट्स                ५.५
हिन्दुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी लि.                     ५.०
आईटीसी लि.                                     ५.०
स्टरलाइट इंडस्ट्रीज (इंडिया)                         ५.०
के एस के एनर्जी वेंचर लि.                          ४.०
हार्मोनी इलेक्टोरल ट्रस्ट                             ३.५
( आकड़ा के स्रोत : राजस्थान पत्रिका १२.१.१२)
ये  सब आकडे तो  दाल में नमक की तरह हैं. इसके अलावा भी कितने ज्ञात अज्ञात स्रोतों से कितने रकम का  लेन देन होता है ये सब तो देनेवाले  और लेनेवाले ही जानते होंगे. ऐसे माहौल में चुनाव आयोग की सक्रियता, निष्पक्ष चुनाव, पार्टी, उम्मीदवार, विकास, जनहित, और  चाल - चरित्र जैसी बातें मात्र मतदाता को  धोखा देने के आलावा कुछ नहीं है. शायद यही लोकतंत्र की नियति है.



लड्डू,
बैना,
सोहर,
बबुआ के जनम.
*****************
लटके  मुह,
चिढे लोग
कोसना
बिटिया का जमन.
***************
माँ  रोवे,
बाप रोवे ,
भाई रोवे,
गांव रोवे,
भाभी  हँसे,
बेटी की विदाई.
*****************
सासु धीरज धरावे,
ससुर समझावे,
जेठानी ताना मारे,
रोटी खातिर
पिया परदेश..
*********************************
पंखा मिला,
टीवी मिला,
फ्रिज मिला,
गाड़ी भी मिला,
माचिस न मिला,
बहु जलाने हेतु,
**************************
बाहर निर्गुण,
भीतर लटका ,
दावेदारी,
सुसंस्कृत संगीत प्रेमी
************************
लाठी निकला,
भाला निकला,
माटी खातिर,
माटी में मिला,
माटी का मालिक.

30 December 2011

आइये : गर्व किया जाय

भारतीय वैज्ञानिकों  ने सौर  उर्जा चालित, टच स्क्रीन वाला  ऐसा कम्प्यूटर बनाया है  जो  आई-पोड से भी सस्ता है.
विश्व के ९०% चलने  वाले  कम्प्यूटरों  के चिप का डिजाईन एक  भारतीय द्वारा किया गया है.
विश्व में सबसे अधिक  लोगो को  ( १०,००००० से भी अधिक ) रोजगार  प्रदान करने वाला संगठन भारतीय रेल है,
विश्व में सबसे ज्यादा बिकने वाला डिटर्जेंट पाउडर  ब्रांड भारतीय है
विश्व में सबसे ज्यादा डाकखाने भारत में है .
विश्व के  बेहतरीन बल्लेबाज ,  विश्व वरीयता प्राप्त शतरंज खिलाडी, महिला मुक्केबाज, (Feather weight ) सभी  भारतीय है.
IIT (
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलोजी ) विश्व की  बेहतरीन इंजीनियरिंग प्रतिभा तैयार कर रहा है,
 विश्व के १० सबसे बड़ा धनी लोगों  में भारत के लोग शामिल है,
भारत विश्व का  सरा सबसे बड़ा सड़क श्रंखला वाला देश है,
भारतीय इंजीनियरों ने  विश्व के सबसे ऊँचे पुल का निर्माण द्रास और सुरु नदी ( हिमालय क्षेत्र )  के बीच किया है.
गणित के अति महत्वपूर्ण शाखाओ -  कैलकुलस, trigonometry ( त्रिकोणमिति) ,और  algebra ( बीजगणितकी  उत्त्पत्ति स्थल भारत है,
नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय है,
भारत विश्व का ४था देश है  जिसने  अंतरिक्ष में अपना  PSLV ( Polar Settelit  Launch Vehicle : ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान  ) भेजा है . आदिआदि

यह सर्व विदित है की भारतीय होने  के नाते हमारे पास गर्व करने के लिए  बहुत कुछ है,. हम लोग  उपलब्धि हासिल करने वाले है, मानवता के क्षेत्र में ,
तकनीक के  क्षेत्र में , साहित्य और  संगीत के क्षेत्र में, आध्यात्म के क्षेत्र में. सेवा के क्षेत्र में. त्याग के क्षेत्र में. हमसे कोई भी क्षेत्र अनछुवा नहीं रह गया है.
तो चलिए  जब भी अपने  देश के बारे में किसी  से बात किया जाये  तब हमेशा सकारात्मक रुख अपनाया जाय. भारत  के लिए  जोश को फैलाईये,
जय हिंद

23 December 2011

राजनैतिक आफर


देश में अभी त्योहारों की धूम है. बाजारों में ग्राहकों को लुभाने के लिए लगभग सभी उपभोक्ता वस्तुओं पर आकर्षक आफर दिए जा रहें है ताकि बेहतर व्यापार हो सके. ग्राहकों को दी जाने वाली आफरों में प्रतिशत को लेकर दुकानदारों के बीच काफी प्रतियोगिता चल रही है. हरेक ब्रांड ग्राहकों को लुभाने के लिए अधिकाधिक छूट देकर उन्हें अपनी ओर खिचने की व्यावसायिक कोशिश में लगा हुआ है.
कुछ इसी तरह का बाजार चुनावी त्योहारों में राजनैतिक दलों ने भी सजा रखा है. पर यहाँ एक मूल फर्क है : राजनैतिक दलों (तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल ) ने ये आफर मात्र मुसलमानों के लिए रखा है. तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दलों के नजर में भारत में मात्र मुसलमान ही अल्पसंख्यक है. जैन, बुद्ध, सिक्ख और इसाईं इस दायरे में नहीं आते, क्योंकि वो वोट बैंक की अहर्ताओं को पूरा नहीं करते.
चुनावी पिटारे से तरह तरह के सनातन न पूरा किये जाने वाले वादे और सुविधाओं के श्रोत फुट पड़े है, जो निरंतर प्रवाहमान हैं. तिस पर आलम ये है की भारतीय मुसलमान भी इस सनातनी वादों और सुविधाओं के श्रोत से अपनी प्रगति की घूंट भर कर आह्लादित हो रहा है. दोनों एक दूसरे को छल रहे हैं.
मुसलमानों ने अपने विकास, उन्नति और सबलता का सपना तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दलों के द्वारा चुनावी भोज में फेके गए टुकडो में ही देख रहा है. आखिर कब तक मुसलमान इन वादों, आश्वासनों से खुद को छलता रहेगा? वो क्यों नहीं समझता की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दलों को चुनावी बैतरनी पार करने के समय ही मुसलमानों की याद क्यों सताने लगती है.? वो क्यों छूट, सुविधाओं, आरक्षण के न पूरा किये जाने वाले मौसमी वादों में अपनी प्रगति का राह देखता है?
आजादी के इतने सालों बाद , इतने वादों के बाद देश के मुसलमान के माली हालत में कोई विशेष फर्क दिखाई तो नहीं पड़ता. जबकि प्रत्येक चुनाव में एक से एक बढ़कर दावे किये जाते रहे है.  एक आम मुसलमान आज भी वही खड़ा है जहाँ वो देश आजाद होने के समय था. तमाम सुविधाओं का लाभ सबल और सशक्त मुसलमान ही उठा पाते है, फिर ये सुविधाएँ कैसे जनहितकारी कही जा सकती है? दरअसल यह एक राजनैतिक छलावा मात्र है.
अपने कौमी तरक्की और सबलता के लिए मुसलमानों को खुद सामने आना होगा. मजहबी तंगदिली से ऊपर उठकर सबसे पहले अपने आप को शिक्षित करना पड़ेगा. अपने अधिकारों के लिए खुद को सबल बनाना होगा. अपने लोगों को चुनकर उनसे अपनी मांगे पूरी कराने का दबाव बनाना होगा. वर्ना खुद को इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दलों के चुनावी टुकडो के हवाले कर देना होगा.
मुसलमानों के स्व – घोषित हितैषी नेताओ बसपा (जिन्होंने मुसलमानों के आरक्षण के लिए संविधान में संशोधन तक की राय दे डाली है), काँग्रेस ( जिसका सबसे बड़ा श्रेय तथाकथित तुष्टिकरण के नाम पर देश विभाजन और सर्वाधिक सत्तासीन होने के बावजूद जिसके दौर में मुसलमानों के तरक्की का नतीजा सिफर रहा है ) जैसी पार्टियों से  सावधान रहने के जरूरत है. आखिर भारतीय मुसलमान कब तक ऐसे भ्रम की स्थिति में पड़ा रहेगा ? कब तक राजनितिक खैरात में अपनी तरक्की का रास्ता ढूंढता रहेगा? किसी को तो आकार इस वादों के अमरबेल को नकार कर खुद के बल पर अपना मुकद्दर अपने हाथों से लिखना पड़ेगा.



  

13 December 2011

तुगलकी फरमान


चंद वकीलों, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे नेताओ और स्वतन्त्र सोच और शक्ति रहित मुखिया के सहारे चल रहे सरकार ने सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर रोक लगाने का तुगलकी फरमान जारी कर अपने मानसिक दिवालिएपन का सबूत दिया है.
इस कुकृत्य की पृष्ठभूमि उस वक्त तैयार हुई जब सरकार के कर्मो से दुखी किसी ने नेट पर राजमाता सोनिया और उनके पालतू प्रधानमंत्री के बारे में आपतिजनक सामग्री चस्पा कर दी. इसके बाद सिब्बल की नेट कम्पनियों के अधिकारीयों के साथ १ सितम्बर २०११  को बैठक हुई . चार सप्ताह के भीतर रास्ता निकालने के लिए कहा गया.
२० नवंबर २०११ को फेसबुक पर संप्रदाय विशेष के खिलाफ एक पोस्ट डाला गया, जिसके बाद उदयपुर और  डूंगरपुर में तनाव की स्थिति पैदा होने के फलस्वरूप पोस्ट को हटा दिया गया.
५ दिसंबर २०११ को सोशल नेटवर्किंग साईट वाली कंपनियों को अपने दफ्तर बुलाकर सिब्बल ने चेताया की कंपनियों ने अगर कदम नहीं उठाये तो सरकार कदम उठाएगी.
६ दिसंबर २०११ को सिब्बल ने सेंसरशिप की खुलकर वकालत की, राजमात सम्बन्धी शिकायत और सांप्रदायिक तनाव का हवाला दिया, जिसका पुरजोर विरोध हुआ.
७ दिसंबर २०११ को फेसबुक पर से राजमाता संबधी पोस्ट हटा दिया गया.
९ दिसंबर २०११ को अपनी फितरत के अनुसार जब चौतरफा दवाब पड़ा, तब सार्वजनिक रूप से २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले को नकारने वाले सिब्बल ने कहा इंटरनेट सेंसर करने का सरकार का कोई इरादा नहीं है.
इन तमाम घटनाओ के सन्दर्भ में एक प्रश्न बार बार उठता है की क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले देश का तमगा हासिल कर चुके भारत में चीन और सीरिया जैसे अलोकतान्त्रिक देशो की तरह अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित करने की शुरुआत हो चुकी है?
क्या देश के हर नागरिक को आरोपी या अपराधी मानते हुए और उन्हें शक की निगाह से देखते हुए उनके विचारों और अभिव्यक्ति की निगरानी शुरू होने वाली है?
इंटरनेट आज दुनिया में अभिव्यक्ति का सबसे वृहद माध्यम है. भारत इस मामले में उन देशो में शीर्ष पर है जिसे इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हासिल है. लेकिन लगता है सरकार सोशल नेटवर्किंग साईटो के जरिये लोगों के विचारों व अभिव्यक्ति पर सेंसर की कैची चलाने वाली है.
जब लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों से जनता का संवाद टूट जाता है तब मतदाता अपने विचार और आक्रोश सोशल नेटवर्किंग साईटो पर व्यक्त करने को बाध्य हो जातें है, इसे अपने लिए लोगों की राय और रिपोर्ट कार्ड की तरह देखने के बजाय उस पर रोक लगाने की घृणित कोशिश की जा रही है.
इन दिनों सरकार की इतनी निरंकुशता बढ़ गयी है की विपक्ष के मुद्दे तक निर्धारित करने,बिना वाजिब बहस मुसाहिब के विधेयक की घोषणाएँ कर देने, अपने विरोधियों ( रामदेव बाबा, अन्ना टीम ) पर कानूनी शिकंजा कसने जैसे मुद्दों पर सारी उर्जा व्यय कर रही है.
सरकार में बैठे उन तमाम विदेशी डिग्रीधारकों, अति शिक्षित विद्वानों, अर्थशास्त्रियों को क्या ये बात समझ में नहीं आती की उनकी इस निकृष्ट कोशिश से देश में विदेशी निवेश पर असर पड़ेगा.लोगों के गुस्सा और खुशी जाहिर करने से रोकने से उपजने वाला मानसिक उद्विग्नता कितना विष्फोटक रूप ले सकता है.
दरअसल सरकार की नाकामी से नाखुश लोगों के लिए सोशल नेटवर्किंग साईट्स एक सेफ्टी वाल्व का काम कर रही है.
सरकार का काम इन्हें सेंसर करने के बजाये लोगों को सिखाना चाहिए की क्या देश के हित में है और क्या नहीं है, सरकार को अपनी छवि सुधारने, अपने मतदाताओ के प्रति जबावदेही निर्धारित करने में धयान देना चाहिए.
इसके साथ साथ दोहरी नीति का पालन करने वाली सोशल नेटवर्किंग कंपनियों पर दवाब रखना चाहिए.

01 November 2011

बंगलौर : एक रूप ये भी


बंगलोर के बारे में किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है . इसे भारत का सिलिकान वैली, आई टी हब, पेंशनर्स पैराडाईज, पब सिटी वगैरह कहा जाता है. यहाँ का मौसम खुशगवार होता है. बौधिक क्षमता वाले कर्मचारियों का शहर है, तमाम विधाओं वाले शिक्षण संस्थानों का केन्द्र आदि - आदि. 

लेकिन इसके साथ ही इस शहर का एक स्याह पहलु भी है जो शुरुआत में देखने में तो समझ में नहीं आता. जैसे जैसे आप यहाँ के  स्थानीय लोगों, सरकारी कार्यालयों, शिक्षण संस्थानों के संपक में आते जाते है तब इस शहर की कलइ खुलने लगती है और इसका असली चेहरा सामने आने लगता है जो बड़ी चतुराई से शालीनता के चादर की आड़ में छुपाया गया है.

यहाँ पर बस कंडक्टर को जैसे ही आप ५ रूपये के टिकट के लिए ५ रूपये से अधिक का नोट देंगे तब कंडक्टर टिकट के पीछे आपको वापस किये जाने वाले राशि को लिख देगा.
(क्योंकि अधिकांशतः उनके पास आपको लौटने के लिए पैसे नहीं होते हैं.) इसके पीछे निहितार्थ ये होता है की अव्वल तो आप अपने स्टॉप पर उतरने के हड़बड़ी में टिकट के पीछे लिखी गयी राशि को कंडक्टर से लेना भूल जाएँ. कई बार ऐसा भी होता है की यदि आपका स्टॉप आने वाला है या आ गया तो कंडक्टर जानबूझ कर अन्य यात्रियों से टिकट लेनदेन में व्यस्त होने का ढोंग करने लगेगा, ऐसा भी हो सकता है की वो जान बुझ कर आप से दूर यात्रियों के भीड़ में उलझ जाने का स्वांग करने लगे ताकि आप उस तक न पहुच पाए और मजबूरन आप  को बस से उतरना पड़ जाएँ. ऐसा नुख्सा अक्सर नए लोगों, प्रेमी जोड़ो, और जल्दबाज लोगो के साथ अपनाया जाता है.

 कई बार कंडक्टर ५ रूपये के टिकट के स्थान पर आपसे ३ रूपये लेकर आपको टिकट नहीं देगा, और आपको आपके गंतव्य तक बिना टिकट के पंहुचा देगा. ऐसा अक्सर बंगलौर शहर से उपनगरों को जाने बसों में किया जाता है. ( ये ३ रुपया कहाँ जाता है आप समझ सकते हैं) अशिक्षित लोगों को उपयोग किये गए टिकटों को पुनः बेचा जाता है.

बंगलौर महानगर पालिका ने यात्रियों के सुविधा के लिए दैनिक पास( साधारण बस ४५ एवं वोल्वो बस का ९० रूपये) का प्रावधान रखा है. पास पर यात्री का हस्ताक्षर अनिवार्य होता है. अधिकतर लोग ऐसा नहीं करते. बल्कि कुछ लोग पास का प्रयोग कर उसे वापस कुछ कम राशि में बेच देते हैं.

ऑटो चालक जब मनमाने पैसे वसूलना चाहेगा तब आपसे स्थानीय भाषा में बात करने लगेगा और ऐसा जताने की कोशिश करेगा की उसे हिंदी मालूम नहीं है. जबकि बंगलौर जैसे शहर का लगभग हर ऑटो वाला कामचलाऊ हिंदी जानता ही है. ( ऐसा नुख्सा मुसलमान ऑटो चालक नहीं अपनाते).

आई टी कंपनी के तमाम कैब (कर्मचारियों को ले जाने / ले आने वाले वाहन) रोज नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हैं. उनका GPRS अधिकतर बंद होता है, ऐसा नियम है की यदि कैब में सवार होने वाली पहली कर्मचारी महिला है, तो पिक अप हेतु चालक के साथ में सुरक्षाकर्मी का होना अनिवार्य है ( ऐसा नियम कैब चालकों द्वारा महिला कर्मचारियों के बलात्कार के बाद लागु किया गया था) पर अक्सर ऐसा नहीं होता और महिला कर्मचारियों को उनके भाग्य पर छोड़ दिया जाता है .

यहाँ पर खुले आम गैस रेग्युलेटर बिकते हैं. 

अधिकतर मकान मालिक किराये की राशि का रशीद नहीं देते, और तो और घर का व्यावसायिक प्रयोग करने के बावजूद घरेलु बिजली का बिल अदा करते हैं. 

एक प्लाट को कई लोगों को बेचा जाता है. जमीन, वाहन आदि के पंजीयन में निर्विवाद  निर्धारित राशि घूस के रूप में खुले आम ली और दी जाती है. 

तो अगली बार जब आप बंगलौर ( लगभग अधिकतर भारतीय आजकल बंगलौर के नाम से ही चौंधियां जाते है ) आये तो उपरोक्त तथ्यों को अवश्य ध्यान में रखे.

नोट : आगामी ब्लॉग में कुछ और भ्रम टूटेंगे . 

16 October 2011

तिरोहित होती थाती:


भारतीय गजल सम्राट स्व. जगजीत सिंह ( स्व. शब्द लिखते हुए असीम पीड़ा का बोध हो रहा है) का निधन मात्र एक व्यक्ति का अंत नहीं वरन एक युग का अंत है. उनके गाये गजलों में ओज, सादगी, और आम लोगों को समझ में आने वाले शब्दों और अंदाज के कारण ही जगजीत सिंह हरदिल अजीज और हिन्दुस्तानी गजल गायकी के एक सशक्त ध्वजवाहक थे.
जगजीत जी का निधन कई सवाल खड़े कर गया है, वर्तमान भारतीय संगीत, चित्रकला, अभिनय, लेखन (यानि कला की हर विधा) में धीरे धीरे तिरोहित होती कालजयी कलाकारों के अवसान से उत्पन्न रिक्तता की भरपाई क्या हम कर पा रहे है? क्या आज के भौतिकतावादी दौर में (जहाँ पैसा ही जीवन का मूल लक्ष्य है) हम दूसरा कोई जगजीत सिंह, पंडित भीमसेन जोशी, विस्मिल्लाह खान , बच्चन आदि को  भारतीय कला क्षेत्र के  विभिन्न विधाओ में जन्म लेने की आशा कर सकते है?
ऐसी मान्यता है की कला प्रकृति प्रदत्त गुण होता है. अभ्यास के द्वारा उसे और उन्नत और परिष्कृत बनाया जा सकता है. समाज में उन लोगों पर ये नैतिक जिम्मेदारी बनती है की जिन्हें प्रकृति ने इन गुणों से नवाजा है वो सामाजिक सरोकारों को ध्यान में रखते हुए कला की साधना एक साधक के रूप में करे,और उस कला को आगे की पीढ़ियों को हस्तांतरित करे. इस दौर में सफलता और सुविधाएँ तो आ ही जाती है.
हमारी पिछली पीढ़ियों ने हमें बेहतरीन गायक, चित्रकार, लेखक, अभिनेता देकर अपनी सामुदायिक जिम्मेदारी को पूरी तरह पुष्पित और पल्लवित किया है.उसके प्रतिदान में हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को क्या देकर जा रहे है?
आज के दौर में गायकों का कोई स्तर नहीं है, अश्लीलता से भरे गाने गाने में उन्हें कोई गुरेज नहीं है, चित्रकार अश्लील चित्र बनाकर, थोड़ा प्रचार पाकर ( कभी कभी तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी अनर्गल कर डालने से हिचकिचाते नहीं)  अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेता है. लेखक भी कुछ इसी मानसिकता में जी रहे है. किसी के पास न तो गहन साधना, रियाज और ना ही कला के किये थोड़ा सा त्याग करने का सामर्थ्य नहीं है. हरेक के पीछे बाजारवाद लगा हुआ है, और प्रतिभाओं को अपने हिसाब से संचालित कर रहा है.
इसी तरह अगर प्रतिभाएं एक एक कर तिरोहित होती रहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हमें  सिर्फ रिकार्ड किये गए आवाजो, बनाये गए चित्रों , किताबों से ही अपनी कला की भूख मिटानी पड़ेगी. अगर ऐसा दिन आया तो ये हमारे लिए बड़े शर्म की बात होगी.   

15 September 2011

वोट बैंक की राजनीती


दिल्ली का दहलाना इस बात का संकेत है की कुछ भी हो जाये हम न तो वोट बैंक की राजनीती से ऊपर उठेंगे ना ही अपने ख़ुफ़िया तंत्र को चाक चौबंद बनायेंगे. चाहें लोगो की जान जाये,तो जाती रहे.
इस मर्मान्तक घटना के बाद सरकार और उनके लोगों द्वारा हर बार की तरह लीपापोती ( मसलन – अपराधियों के स्केच जारी किये गए हैं, पुलिस को हाई अलर्ट किया गया है,जाँच जारी है, आदि आदि) का घिनौना दौर शुरू हो गया है. हर बार की तरह इस बार भी किसी संगठन ( राजनैतिक नफा नुकसान एवं तथाकथित तुष्टिकरण के मद्देनजर ) पर इसकी जिम्मेदारी डाल कर अपने कर्त्तव्य की इति श्री कर ली जायेगी.
जब तक अफजल गुरु और कसाब सरीखे देश के ह्रदय पर चोट करने वालों को, देश के लोगों के पैसे पर वोट बैंक की राजनीती खातिर पाला जाता रहा जायेगा तब तक ऐसे अपराधियों के हौसले कम नहीं होंगे. फ़ासी की सजा पाने के बावजूद उन्हें बचा लिया जायेगा. भले इसके विरोध में संसद हमले में शहीदों की विधवाएं पदक तक सरकार के मुंह पर दे मारें.

ब्रेकिंग न्यूज,


सार्वजनिक स्थान,
बाजार,मंदिर,कचहरी,
सामान खरीदते,पूजा करते
पेशी की बाट जोहते लोग,
अचानक एक धमाका,
बस धुवाँ ही धुवाँ,
मरते , कराहते लोग,

मिडिया, प्रेस, तमाशाई,
ब्रेकिंग न्यूज,
नेता का आगमन,
घिसे – पिटे बयान, झूठा आश्वाशन
नाकामी ढकने खातिर,
राहत – राशि की घोषणा,
स्केच जारी,
अस्पताल दौरा,
कुछ दिन खातिर सुरक्षा चुस्त,
धीरे धीरे सब नरम,

अब....

अगले घटना के,
खुराक बनने के लिए 
तैयार रहे लोग.

( मुझे हरेक  नपुंसक आतंकी घटना में मृत लोगों और उनके शेष बचे परिवार के प्रति हार्दिक संवेदना है. इससे  कई गुना घृणा लाशों पर राजनीतिक रोटी सकने वाले नेताओ से, उससे भी  ढेर घृणा उन आम लोगों और उनकी सोच पर है, जो  कुछ दिन बाद सब भुला कर फिर मरने के लिए तैयार हो जाते हैं.)


22 April 2011

शहर


उसने ,
अपने पसीने से
शहर की ,
बगिया को सींचा.

उसने ,
अपने रतजगे से,
शहर की ,
पहरेदारी की,

उसने,
अपने श्रम से,
शहर की,
इमारतें खड़ी की,

उसने,
सब कुछ छोड़,
शहर से ,
आशनाई की,

पर...
हाय  रे हतभाग्य...
उसे उसी शहर ने,
बेदखल कर डाला,
क्योंकि ,
वोह उस शहर की बोली वाला ,
जात वाला
  था.